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Sunday, 2 March 2014

मौत से अपनापन :-)

जब इंसान दुःख, दर्द और तकलीफों से रुबरु होता हैं
उनसे जूझ रहा होता हैं तब सही मायनों में वो जी रहा होता हैं
यक़ीनन वो वक़्त हमें बहुत तकलीफ देता हैं लेकिन
पीछे मुड़कर देखने पर जिंदगी का सबसे हसीन वक़्त वो ही नजर आता हैं
वो वक़्त हमें बहुत संजीदा और समझदार बना जाता हैं :-)
हम्म.…आज फिर से पुराने पन्नों से एक और रचना-

"हर रोज इंसानों को हँसते हुए देखती थी 
आज किसी रोते हुए को देखा तब दर्द का एहसास हुआ !!
आज किसी की लाश से बातें की 
तब पता चला कि लोग मरने पर कैसे रूठ जाते हैं !!
दो गज जमीन और एक मीटर कफ़न के लिये 
इन्सान सारी दूनिया का ही सफ़र तय कर लेता हैं !!
आज सोचा लोग जीते जी तो प्यार से बात भी नहीं करते हैं 
तो फिर मरने पे यू आँसू क्यों बहाते हैं ??
आज किसी की मौत देखी तो मुझ नादान परिंदे को एहसास हुआ कि 
मैंने यू ही खो दिया कुछ लोगों को केवल आकाश में उड़ने के लिए जबकि मेरे पैरों को तो एक दिन जमीन पर भी पनाह नहीं मिलेगी !!
जीते जी कोई हाल नहीं पूछता 
तो मौत पर क्यों चले आते हैं बारात की तरह ??"

"कैसे कहू क्या हैं जिंदगी 
कभी दो पल की ख़ुशी तो कभी आँखों का पानी है जिंदगी !!
कभी किसी की यादों में खोना जिंदगी हैं तो 
कभी किसी के साथ रहकर भी अकेली हैं जिंदगी !!:-)"


2 comments:

Yashwant Yash said...

जीते जी कोई हाल नहीं पूछता
तो मौत पर क्यों चले आते हैं बारात की तरह ??

ऐसा ही होता है। आपके मन में या प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है।


सादर

sarika bera said...

haa shayad......