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Saturday, 25 February 2017

आ अब लौट चलें!! :)

प्रकृति का नियम हैं अगर किसी चीज़ को नकारा जायेगा तो वो फिर से अपना अस्तित्व पाने के लिए फिर से अपना कोई नया या पुराना रूप लेगी...होता हैं यूँ मेरे ख्याल से तो खेर मुझे लिखने का शौक कब से हैं, शायद मुझे खुद नहीं पता, क्यों हैं इसकी भी ठीक-ठीक कोई वजह भी नहीं हैं क्यूंकि मेरे परिवार के सदस्यों में से आज तक तो किसी ने लिखा नहीं हैं हां थोड़ा बहुत शौक रहा था बचपन में मेरे पिताजी को और शायद तब उन्होंने कुछ कुछ लिखा भी था पर एक अरसे बाद चीजें, अल्फाज़ सब भुला दिए जाते हैं, हां तो बस शौक रहा, पैशन रहा, लिखना वो चीज़ हैं जिसके लिए हमेशा पागल रही, बचपन से आज तक ना जाने कहाँ-कहाँ लिखकर रखा हुआ हैं, कुछ डायरियां कैद पड़ी हैं, कुछ सपने छुपा रखें हैं, कुछ अनकही सी बातें दबा रखी हैं, और पुरानी यादों को मैंने अब पुराना ही रहने दिया हैं और उनकी चाबी कहीं खो दी हैं....डायरी हमेशा से जीवन का एक अहम् हिस्सा रही कॉलेज तक हमेशा लिखना जरुरी था, फिर फेसबुक का आगमन हुआ हमारी दुनिया और ऐसे ही ब्लॉग का भी (www.meraapnasapna.blogspot.com) हमने दोनों जगह का भरपूर उपयोग किया, हमने बेशुमार लिखा ऑनलाइन की दुनिया में खूब लोगों तक चर्चे पहुंचें हमारे, अपनों को भी खबर हुई कि लिखते भी हैं हम, मेरे पिताजी से अब लोग मिलते तो कहने लगे थारी बाया लिखें छोको हैं!! :)😍
माँ से कुछ कह भी देते ओ हो लिखती हैं वो...सबको अच्छा बताती हैं पर वो कब से अच्छे थे पर मेरे माँ तो हैं ही बेहद निराले व प्यारे...हंसकर कह देते हैं लाडली हैं मेरी जो मन कर दें लिख दिया प्रॉब्लम क्या हैं आखिर कुछ कर ही रही हैं...तो कोई अपनी सोच दर्शाने को कह ही देती हैं कभी-कभी कि थारी छोरी लिखें दहेज़ नी देवड़ो बणी हैं समाजसेवक....हहाह्हाहाहा...वो माँ हैं मेरे बेहद प्यार करते हैं मुझसे कभी लिखने के लिए मना नहीं किया...मेरी भावनाओं को समझा जब भी पेपर लाके रखा उनके सामने ख़ुशी से बोलें बेटी छपी हैं काई म्हारी...काई लिख्यो हैं दका पढर सुणा तो...बहुत बार सुनाया हैं कभी कभी नहीं भी...होता हैं ज़िन्दगी में यूँ भी जब हम अपनी जिद्द में रिश्तों को हार रहे होते हैं तो दुनिया का सारा ज्ञान कम पड़ता हैं...लिखती जा रही हूँ कि पोस्ट बड़ी होती जा रही हैं....एक्चुअली पिछले कुछ दिनों से ख्याल आ रहा हैं कि लिखना अलग और जीवन में सारी बातों को प्रयोग में लेना अपनी जगह और सोशल मीडिया के अपने फायदे-नुकसान हैं, कोई यूँ ना सोचें यूँ कितना ज्ञान देती रहती हैं जबकि खुद में झांको तो सारी बुराइयाँ भरी पड़ी हैं बस ऐसे ही कुछ ख्याल आ रहें तो यहाँ कम ही लिखने का सोच रहें हैं और यहाँ लिखने का एक भारी नुकसान हुआ पिछले कुछ सालों से डायरी लिखना भूल गए जबकि उसके अपने फायदे थे वहां कोई आपको जज नहीं करता आप अपनी कहानी के डायरेक्टर, प्रोडूसर व एक्टर सब खुद ही होते हैं और वहीँ बेस्ट निखरकर सामने आते हैं, अभी पिछले दिनों एक दिन मुझे रात को नींद नहीं आ रही थी मन बार-बार बैचैन हो रहा था मैंने करीब तीन बजे अपनी 2012 की डायरी निकाली(डायरी में नहीं लिखने की वजह से अभी भी कुछ पन्ने खाली पड़े हैं तो वक़्त-बेवक्त उसका यूज़ करती हूँ) मैंने देखा मैंने 23rd अक्टूबर 2016 को एक पन्ना लिखा था उसके बाद 2017 की उसमें कोई एंट्री नहीं थी मतलब मैंने डायरी को नया साल तक विश नहीं किया था!! :(
मैंने कुछ लफ्ज़ लिखें उसमें, कुछ देर चुपचाप बैठी रही, मतलब मुझे उस वक़्त सबसे ज्यादा सुकून मेरी डायरी दें रही थी, मैंने फेसबुक, अपने स्मार्टफोन सबको परे रखकर अपनी पुरानी डायरी को चुना....आज से फिर मैं अपनी डायरी की और रुख कर रही हूँ अब नयी खरीदने जा रही हूँ जल्द ही 2017 की...उसीमें लिखूंगी आपकी, मेरी, सबकी कहानियां!! :) 😍😘

8 comments:

Ramavtar Inaniyan said...

Great Job..
Keep it up...
Nice Thought.

Ramavtar Inaniyan said...

My Father has Passed away one month ago.He was Great Person.He is far away from where never come,leave me alone.But sometimes Your life living creatures inspired to me.So Best wishes for your Journey.
. your Well Wisher

Ramavtar Inaniyan said...

पापा बहुत याद आओगे इतनी जल्दी आप दुनिया को अलविदा कह दोगे, ये कभी सोचा ही नही था।
एक अचानक आई बीमारी ने आपको हमसे छीन लिया।
आप हमेशा से मेरे आदर्श रहे है और आगे भी रहेंगे।आपने जिंदगी चाहे छोटी जी ,पर बड़े शान से जी।
आपने जिंदगी में हमेशा परोपकार और दूसरों की भलाई का काम किया। आपने हमे जीना सिखाया।
भले ही आज आप इस दुनिया में नही है लेकिन आप के सिखाये हुए शिष्टाचार हमेशा हमारे साथ रहेंगे।
पिछले एक महीने से मेरी जिंदगी ही बदल गई। मेरी सोच और जीने का तरीका ही बदल गया। उस एक महीने में मैने जो सीखा , वो मेरी जिंदगी को बहुत प्रभावित करेगा।
10 दिसम्बर तक सब कुछ ठीक ठाक चल रह था ।
12 दिसम्बर को पापा को जोधपुर के MGH हॉस्पिटल में एडमिट करवाया। "Low Platelet Count" होने पर डॉक्टर ने शूरू में डेंगू समझ के नार्मल treatment स्टार्ट किया but Platlet count ऊपर नही आ रहे थे । इसलिए मैंने जोधपुर में एक प्राइवेट लेब्रोटरी से ब्लड टेस्ट करवाया। उस पैथोलोजिस्ट ने ब्लड रिपोर्ट की एनालिसिस करके Bone Marrow टेस्ट करने के लिए बोला। डॉक्टर ने Bone Marrow किया और उसका रिजल्ट 15 दिसम्बर को इवनिंग में आया । मेने डॉक्टर को रिपोर्ट दिखाई और डॉक्टर ने बोला रिपोर्ट अच्छी नही है। रिपोर्ट में "Acute Lymphoblastic leukemia" ( A blood Disorder) नाम की एक बीमारी डाइग्नोसिस हुई जो की normally छोटे बच्चो में होती है।
डाइग्नोसिस होते ही में बहुत हताश और दुखी हो गया। लेकिन मेने हिम्मत राखी और उसके इलाज़ के बारे में सोचने लगा। मेने मेरे शूभचिंतको से इसके बारे में राय ली । फिर फाइनली मुझे थोड़ी ख़ुशी तब हुई जब मुझे पता चला की इस बीमारी का इलाज है। मेने immediatly Baroda में इसका इलाज कराने का डिसिशन लिया। 16 दिसम्बर की इवनिंग में 3 बजे हम बरोडा के लिए रवाना हो गए और अगले दिन 17 दिसम्बर को पापा को Sterling Hospital Baroda में admit करवाया। डॉक्टर से डिसकस करने के बाद डॉक्टर ने लाइन ऑफ़ ट्रीटमेंट बताया और ट्रीटमेंट के रिस्क बताये । मेने High Risk Consent Sign किया , मन में थोड़ा डर था लेकिन बीमारी का इलाज तुरंत जरुरी था। 24 december से 3 जनुअरी तक थेरेपी चली।
ट्रीटमेंट के दौरान total 35 टाइम्स SDP (सिंगल डोनर प्लेटलेट ) और 10 टाइम्स PCV ट्रांसफ्यूज़ हुआ। ये इतना आसान काम नही था मेरे लिए लेकिन मेरे दोस्तों ने इस काम को आसान बनाया और उनोंने मेरी हर तरीके से मदद की ।
Treatment के दौरान ज्यादातर टाइम में ही पापा के पास रहता था। शायद उनको पहले ही आभाश हो गया कि मुझे अब दुनिया को अलविदा कहना है , इसलिये वो मुझे कुछ अपनी इच्छाये बताते थे।
उनोंने मुझसे बोला की यदि में नही रहूं , तो मेरे जाने के बाद मेरे अंग किसी के काम आ सकते है इसलिए अंगदान करना चाहता हूँ,लेकिन unfortunately उनकी ये इच्छा पूरी नही पाई क्योकि इस बीमारी वाले अंगदान नही कर सकते। कुछ पश्चताप किये।
17 January शाम को 8:20 पे उनोंने देह त्याग किया।
एक पिता का कर्ज तो कोई चूका नही सकता क्योंकि वो अपने लिए भगवान होते है लेकिन मेने उनको बचाने की एक असफल कोशिश की। मुझे जिंदगी भर इस बात का अफ़सोस रहेगा। काश में मेरे पापा को इस बीमारी से निकाल पाता।
आज मेरे पापा मेरे साथ नहीं है लेकिन उनके सिदान्त, उनके आचार विचार और उनकी शक्ति हमेशा मुझे बल देते रहेंगे।
Miss u Papa

Ramavtar Inaniyan said...

फूल पेड़ की टहनी पर लगता हो लेकिन पेड़ हमेशा जड़ से जुड़ा रहता है। Great PaPa, Everything #miss_u_Papa😢😢
# खाने की इच्छा मत रखो,खिलाने की रखो
# पैसो, धन-दौलत से ज्यादा आदमी को तवज्जो दो
# ट्रेन या बस में बुजुर्ग,औरत ,छोटा बच्चा खड़ा हो तो उसे अपनी सीट दो।
# चिड़ी चोंच भर ले गई, नदी ने गटियो नीर,
दान करिया धन न गटे, कह गए संत कबीर।
# जो है, उससे संतुष्ठ रहो, जिंदगी को हमेशा सकरात्कम रखो।
---- जिंदादिल पापा----

Ramavtar Inaniyan said...

These same thing happened with me..
वो दोनों एक-दुसरे से गले लगकर खूब देर तक रोते रहें, उन्हें देखने वाले हर शख्स की आँखें नम थी, आज उनकी दुनिया बहुत अधूरी व अकेली थी, यूँ नहीं होना चाहिए बचपन से पिता का साया कभी जल्दी नहीं उठना चाहिए, फिर उसने उसे गले लगाया, अपने बड़े होने का प्रमाण दिया और फिर बहुत देर तक फिर से वो दोनों भाई-बहन रोते रहें....नहीं नहीं यह नियति नहीं हैं, वो खुदा ना सच्ची कभी-कभी बुरा कर देता हैं क्या यकीन नहीं हो रहा हैं!!

राकेश कुमार श्रीवास्तव राही said...

आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/02/8.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

sarika choudhary said...

Thank u sir!! :)

sarika choudhary said...

:)