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Friday, 16 May 2014

"रुक जाना नहीं कहीं तू हार के"…

जिंदगी में फैसले लेना सबसे मुश्किल होता हैं 
कितने लोगों की खुशियों का ख्याल रखना पड़ता हैं 
कितने लोगों की मुस्कुराहट आँखों के सामने घूम जाती हैं 
कितने बेसहारे से चेहरे दिल को दुखा जाते हैं 
हक़ नहीं होता हैं केवल अपना ही अपनी जिंदगी में 
बाकि लोगों की खुशियां व् जिंदगियां भी जुड़ी होती हैं हमसे :-)
सपनों का, मंजिल का, अपनों की खुशियों का कितना कुछ हैं 
जिसका ध्यान व ख्याल रखना पड़ता हैं 
पिछले कुछ दिनों से इस दिमाग पर कोई भूत सवार हो रखा हैं 
सो पापा कहते हैं कौनसे फील्ड में जाना चाहती हो तो 
मेरा जवाब होता हैं मैं बहुत पैसे कमाना चाहती हू 
मैं चाहती हू कि मेरा बहूत बड़ा रुतबा हो 
वो थोड़े चिंतित हैं कि मैं भला ऐसी बातें क्यों कर रही हू ??
लोग पूछते हैं हमसे प्यार करती हो तो 
फिर से मेरे उटपटांग जवाब मुझे प्यार करने का कोई हक़ व अधिकार ही नहीं हैं :(
दोस्तों से भी गीले-शिकवे बयां कर रही हू 
अपनों से भी समस्याएं हो रही हैं 
उफ्फ आजकल तो सबसे ज्यादा अपने आपसे भी :-)
आज मैं अपने ही लिए कहना चाहूंगी -
"रुक जाना नहीं कहीं तू हार के"……………
अब मेरे व मेरी मंजिल के बीच कोई नहीं आ सकता 
इरादें व उम्मीदें बिल्कुल साफ़ व नेक हैं 
ना किसी का प्यार मुझे बहका सकता हैं 
ना अपनों के आंसू रोक सकते हैं 
ना अपनों की मजबूरियाँ बीच राह में रोक सकती हैं 
ना मेरे लिखने का पागलपन मुझे ठहरा सकता हैं 
अब मैं अपनी जिंदगी को एक नई करवट लेने दूंगी 
अब मैं अपनी साँसों को थोड़ा गुनगुनाने दूंगी 
मीन्स मैं कुछ वक़्त के लिए सबके साथ-२ अपनी 
जिंदगी की सबसे प्यारी डायरी मतलब ब्लॉग से भी ब्रेक ले रही हू :-)

3 comments:

Kailash Sharma said...

अपने जीवन के फैसले लेना तो सही है पर यह ब्लॉगिंग से सन्यास क्यों?

Digamber Naswa said...

सही समय पर सही फैंसले ... सोच समझ कर लेने चाहियें ... ब्लोगिंग और सोशल मीडिया से तो कभी भी जुड़ा जा सकता है ... बहुत बहुत शुभकामनाएं ...

संजय भास्‍कर said...

सोच समझ कर सही फैंसले लेने चाहियें