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Wednesday, 9 April 2014

....कुछ मिलता सा हैं मेरे जीवन से :-)

एक दिन शाम बेहद ही उदास थी भविष्य की आकांक्षाओं व चिंताओ ने आ घेरा 
सो वक़्त व माहौल भी बदल गया था ,मैं थोड़ी संजीदा हो गयी थी 
माँ ने मेरा चेहरा पढ़ते हुए कहा बता दो हमें क्या फ़िक्र हैं ??
मैं उस खुदा का शुक्रिया अदा करती हू अपनी हर साँस में मुझे इतने 
अच्छे पेरेंट्स देने के लिए……जिनकी तारीफ के लिए मेरे  पास शब्द नहीं हैं :-)
वरना लोग चेहरा तो दूर की बात हैं कहे गए शब्द भी नहीं समझ पाते हैं :(
फिर पापाजी ने पूछा आजकल काफी परेशां रहती हो 
बताने भर से भी मन हल्का व आदि समस्या हल हो जाती हैं कह दो क्या टेंशन हैं ??
मेरी आँखें बरस पड़ी ,बहुत अधिकार जता देती हू मैं नाराज हो जाती हू 
अगर वो मुझे बुरे के लिए टोके तो जबकि मेरे हालातों व मेरे हर लड़खड़ाते 
कदम पर केवल वो ही तो लोग मुझे सहारा देते हैं ,मुझे सम्भालते हैं :-)
कुछ देर रोने के बाद मैं बोली -
पापाजी मैं बाकि लड़कियों की तरह नहीं जीना चाहती हू 
मेरा केवल एक यही सपना नहीं हैं कि बस केवल एक अपना परिवार हो और उम्र कट जाए 
मैं केवल इतना ही नहीं सोच सकती कि मुझे तकलीफ नहीं हैं मीन्स सारी दुनिया भी खुश हैं 
मैं अपने दम पर जीना चाहती हू ना कि दूसरों के कंधो पर 
मैं चाहती हू लोग मेरे मरने के बाद भी मेरी जिंदादिली को याद रखे 
वरना पनपते और टूटते तो पेड़-पौधे भी हैं :(
पापाजी आप भी जानते हैं कि जिस उम्र में लड़कियाँ बहकने सी बातें करती 
हैं उस उम्र में मैंने सब मुसीबतों को झेलना सिखा 
अपने आपको हर पल सम्भाले रखने की कोशिश की और कभी चुपके से आपने गिरने से बचा लिया 
जिस उम्र में लड़कियाँ कुछ वक़्त सजने-संवरने में बिता देती हैं 
उस उम्र में मैंने अपने आपको दुनिया की सोच ,फिकर ,कुछ लिखने की 
ज़िद्द में व्यस्त किया कि मुझे अपनी शक्ल याद ही नहीं रही :-)
जिस उम्र में लड़कियों पर अंगुलियाँ उठायी जाती हैं 
उस उम्र में मैंने अंगुलियों के पेरवे तक तो अपनी तरफ नहीं उठने दिया 
उल्टा परशंसा पाने के बाद भी मैंने उन्हीं अँगुलियों पर कुछ लिखा 
क्यूंकि वो अंगुलियां मेरी तरफ नहीं उठती हैं तो क्या हुआ 
मेरे जैसी ही मासूम बच्चियों पर तो उठती ही हैं :-)
जिस उम्र में किसी राजकुमार के सपने संजोये जाते हैं 
उस उम्र में मैंने कुछ अच्छा काम करने के सपने देखे हैं :-)
आप भी जानते हो कि मैंने कुछ पाने की चाहत में बहुत कुछ खोया व छोड़ा हैं 
पर मुझे कोई अफ़सोस नहीं हमेशा बस मेरी तो चाहत केवल इतनी ही रही
 कि कोई नेक काम किया जाए etc ................\
हूह उस दिन पहली बार पापाजी को जो मन में आया वो बताने में कामयाब हो पाई 
वरना आज तक मेरी सारी बातें वो केवल दो कागजों में ही पढ़ते थे 
जब-२ इच्छा होती हैं मैं उन्हें पत्र लिखने का ही काम करती हु 
हिम्मत आ गयी थी इस बार इसलिए बोलकर ही बता दिया था वाओ:-)
अब मन थोडा हल्का हो गया था ………
पापाजी ने कहा मैं केवल इतना चाहता हू कि तुम हमेशा खुश रहो 
मैं तुम्हारे चेहरे पर उदासी की शिकन तक नहीं देखना चाहता :-)
बहुत-२ आभार पापा ………बस यू ही वक़्त-बेवकत हमेशा मेरे साथ रहिए !!!

3 comments:

Yashwant Yash said...

कल 11/04/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर

sarika bera said...

aabhar sir......:-)

संजय भास्‍कर said...

क्या बात है!! बहुत सुन्दर